Hindi Grammar हिन्दी व्याकरण With PDF - Skills Hindi

Hindi Grammar हिन्दी व्याकरण

सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘सामान्य हिन्दी’ का अत्यंत महत्व है। परीक्षाओं में सामान्य हिन्दी से मुख्यतः हिन्दी व्याकरण (Hindi Grammar), तथा हिन्दी साहित्य से प्रश्न पूछे जाते है। हमने यहाँ आपके लिए हिन्दी व्याकरण (Hindi Vyakaran) के समस्त Topics को क्रमानुसार व्यवस्थित किया है जिससे आपका इसके प्रत्येक Topics का आसानी से अध्ययन हो सके और आपकी आगामी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने की राह को सुगम बना सके।

यहाँ आपको सामान्य हिन्दी के मुख्य Topic हिन्दी व्याकरण (Hindi Grammar) की समपूर्ण महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश किया है। कृपया इसका लाभ प्राप्त करे तथा इसे अपनी अध्ययन सामग्री में संमलित करें।

व्याकरण का अर्थ

व्याकरण वह शास्त्र है जो किसी भाषा के स्वरूप को स्पष्ट करता है तथा उसे शुद्ध बोलने, लिखने, और समझने का ज्ञान देता है। व्याकरण के द्वारा भाषा के नियमों को स्पष्ट किया जाता है। व्याकरण भाषा की मर्यादा का उल्लंघन करने से रोकता है।

किसी भाषा का का निर्माण शव्दों, वर्णों और वाक्यों के संयोग से होता है। व्याकरण के अंतर्गत लिंग, संज्ञा, वचन, कर्क, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया आदि का वर्णन किया जाता है।

शब्द की परिभाषा – एक या एक से अधिक वर्णों से बनी हुई सार्थक ध्वनि या स्वतंत्र ध्वनि को शब्द कहते है।

शब्द भेद

प्रयोग के आधार पर शब्दों की अनेक जातियाँ होती है, जिन्हे शब्द बेड कहा जाता है शब्द भेद को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है

  1. सार्थक शब्द – सार्थक शब्द वे शब्द होते है जिनका कोई अर्थ होता है। सार्थक शब्दों को निम्न प्रकार से बाँटा गया है
    • रचना के आधार पर -रूढ़ शब्द, यौगिक शब्द, योगरूढ़ शब्द
      1. रूढ़ शब्द – रूढ़ शब्द वे शब्द होते है जिनका कोई भी सार्थक खण्ड (संधि विच्छेद) नहीं होता जैसे – नाक, जल, आग आदि
      2. यौगिक शब्द – दो या दो से अधिक सार्थक खण्डों के योग से मिलकर बना होता है जैसे – राजपुत्र (राजा का पुत्र), विज्ञान (वि+ज्ञान)
      3. योगरूढ़ शब्द – वे शब्द जो यौगिक शब्द तो होते है परंतु इनका अर्थ सामान्य अर्थ को प्रकट न कर किसी विशेष अर्थ का प्रकटीकरण करते है जैसे – जलज (जलज का सामान्य अर्थ है जल में जन्मा) किन्तु यह विशेष अर्थ में केवल कमल के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
    • उत्पत्ति के आधार पर – तत्सम् शब्द, तदवभ शब्द, विदेशी शब्द, संकर
      1. तत्सम् शब्द – वे शब्द जो संस्कृत भाषा से हिन्दी भाषा में आए और ज्यों के त्यों प्रयुक्त हो रहे है जैसे – राजा, पुष्प, कवि, भ्राता, वायु आदि
      2. तदवभ शब्द – वे शब्द जो संस्कृत से उत्पन्न या विकसित हुए है जैसे – मोर, चार, फूल, आदि
      3. विदेशी शब्द – वे शब्द जो किसी विदेशी भाषा से आए हो। विदेशी भाषा से आने के कारण इन्हे आगत शब्द भी कहा जाता है। हिन्दी भाषा में अनेक शब्द विदेशी मूल के है किन्तु परस्पर संपर्क में आने के कारण हिन्दी भाषा में प्रचलित हो गए। जैसे ऑर्डर, आदमी, अदालत क्रिकेट आदि
      4. संकर शब्द या अर्द्धतत्सम शब्द – संस्कृत भाषा के वे शब्द जो प्राकृत भाषा के बोलने वालों के उच्चारण से बिगड़ते-बिगड़ते कुछ और ही रूप के हो गए है जैसे- मुँह, बंस, अच्छर, कारज आदि
    • अर्थ के आधार पर – पर्यायवाची, विलोम शब्द, एकार्थी शब्द, अनेकार्थी शब्द
  2. निरर्थक शब्द – वे शब्द जिनका अपना कोई खास अर्थ नहीं होता है वह निरर्थक शब्द में आता है। निरर्थक शब्द दो प्रकार के होते है
    • विकारी – संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया
    • अविकारी – क्रिया विशेषण, संबंध बोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादि बोधक

संज्ञा

संज्ञा की परिभाषा – किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या भावों के नाम को संज्ञा कहते है। (जिसका अस्तित्व होता है या होने की कल्पना की जा सकती हो के नाम को संज्ञा कहते है)

संज्ञा का उदाहरण – व्यक्तियों के नाम (राम, श्याम, मोहन), वस्तुओं के नाम (पेन, किताब, पंखा) स्थानों के नाम (आगरा, दिल्ली लखनऊ) भाव (ईमानदारी, अच्छाई, बुराई, सहायता) आदि

संज्ञा के भेद – व्याकरण में संज्ञा के पाँच भेद माने जाते है। जातिवाचक संज्ञा, व्यक्तिवाचक संज्ञा, भाववाचक संज्ञा, समूहवाचक संज्ञा, द्रव्यवाचक संज्ञा

  1. जातिवाचक संज्ञा – जातिवाचक शब्दों में किसी एक खास वस्तु, स्थान, व्यक्ति के लिए न कहकर वल्की उसकी पूरी जाति (एक ही प्रकार की अनेक वस्तुओं) का बोध होता है उन्हे जातिवाचक संज्ञा कहते है।  जैसे किसान, अध्यापक, तोता, पुस्तक, बिजली शहर, नदी, पर्वत आदि
  2. व्यक्तिवाचक संज्ञा – जिन संज्ञा शब्दों से एक ही वस्तु, व्यक्ति, या स्थान आदि का बोध होता है उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते है जैसे – राम, महात्मा बुद्ध, श्याम, कृष्ण
  3. भाववाचक संज्ञा – वे शब्द जिनमेँ किसी वस्तु के गुण, दशा, व्यापार आदि भाव का स्पष्ट बोध हो रहा होता है उन्हे भाववाचक संज्ञा कहते है। जैसे – सुन्दरता, जवानी, उन्नति, शत्रुता, मित्रता आदि
  4. समूहवाचक संज्ञा – जिन संज्ञा शब्दों से किसी एक जाति की वस्तुओं का समूह का बोध होता है उन्हे समूहवाचक संज्ञा कहते है। जैसे – कक्षा, सभा, गुच्छा, सेना, संघ दल आदि।
  5. द्रव्यवाचक संज्ञा – वे संज्ञा शब्दों में ऐसे पदार्थों या द्रव्य का बोध होता है, जिसे हम नाप-तोल सकते है पर गिन नहीं सकते है, उन्हें द्रव्यवाचक संज्ञा कहते है। जैसे – दूध, पानी, आटा, घी आदि।

लिंग

लिंग की परिभाषा – लिंग शब्द संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है – चिन्ह। संज्ञा के जिस रूप से पुरुषत्व या स्त्रीत्व का बोध हो उसे लिंग कहते है।  जिस चिन्ह द्वारा यह ज्ञात किया जाए की अमुक शब्द पुरुष जाति का है या स्त्री जाति का, उसे लिंग कहते है।

लिंग के प्रकार – हिन्दी में लिंग दो प्रकार के होते है

  1. पुल्लिंग – जिन शब्दों से यथार्थ पुरुषत्व का बोध हो उसे पुल्लिंग कहते है जैसे- लड़का, बेल, घोड़ा आदि
  2. स्त्रीलिंग – जिन संज्ञा शब्दों से यथार्थ या कल्पित स्त्रीत्व का बोध होता है उन्हे स्त्रीलिंग कहते है जैसे- लड़की, गाय, लता आदि

वचन

वचन की परिभाषा – संज्ञा के जिस रूप से किसी व्यक्ति, वस्तु के एक या एक से अधिक होने का बोध होता है उसे वचन कहते है।

वचन के भेद – हिन्दी में वचन दो प्रकार के होते है

  1. एकवचन – शब्द के जिस रूप में एक वस्तु का बोध होता है, उसे एकवचन कहते है। जैसे – नदी, लड़का, कमल आदि
  2. वहुवचन – शब्द के जिस रूप में अनेक वस्तुओं का बोध होता है उसे वहुवचन कहते है। जैसे – लड़कें, नदियाँ, घोड़े आदि।

कारक

कर्क की परिभाषा – संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के जिस रूप से उसका संबंध वाक्य के अन्य शब्दों से जोड़ा जाता है, उन्हें कारक कहते है। इन्हे विभक्ति या परसर्ग भी कहा जाता है।

कारक के भेद – हिन्दी भाषा में आठ कारक माने गए है जो निम्न प्रकार है।

Trick – (कर्ता ‘ने’ कर्म ‘को’ करण ‘से’ सम्प्रदान ‘के लिए’ अपादान ‘से’ सम्बन्ध ‘का,की,के, रा, री,रे’ अधिकरण ‘में पर’ सम्बोधन’ हे राम, अरे ओह’)

कारकविभक्ति चिन्ह / परसर्ग
1. कर्ताने
2. कर्मकॉ
3. करणसे / के द्वारा
4. सम्प्रदानके लिए
5. अपादानसे (अलगाव-अलग होना)
6. सम्बन्धका। की, के,/ रा, रि, रे
7. अधिकरणमें / पर / ऊपर
8. सम्बोधनहे, हो, अरे, ओह,
Hindi Grammar
  1. कर्ता कारक – (‘ने’ प्रत्यक्ष या अपत्यक्ष रूप से) जिस शब्द द्वारा काम करने का बोध होता है उसे कर्ता कारक कहते है जैसे- राम ने रोटी खाई
  2. कर्म कारक – (‘को’ प्रत्यक्ष या अप्रत्ययक्ष रूप से लगे) वाक्य में क्रिया का प्रभाव जिस शब्द पर पड़ता है उसे कर्म कारक कहते है जैसे – श्याम ने गीता को पत्र लिखा।
  3. कारण कारक – (से/के द्वारा) संज्ञा का वह रूप जिससे किसी क्रिया के साधन का बोध हो, उसे करण कारक कहते है। जैसे – तुम कलम से लिखते हो,
  4. सम्प्रदान कारक – (के लिए, को) जिसके लिए कुछ किया जाए या जिसको कुछ दिया जाए इसका बोध करने वाले शब्दों को सम्प्रदान कारक कहते है। जैसे – माँ ने बच्चे के लिए खिलौने खरीदे।
  5. अपादान कारक – (से) संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से दूर होने, डरने, निकलने, विद्या खिकहने, तुलना करने का भाव प्रकट होता है, उसे अपादान कारक कहते है। जैसे – हिरण शेर से डरता है।
  6. सम्बन्ध कारक – (का, की, के, री, रे, रा) संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी अन्य शब्द के साथ सम्बन्ध या लगाव प्रतीत हो उसे सम्बन्ध कारक कहते है। जैसे – उस वृद्ध व्यक्ति की तीन पुत्रियाँ है।
  7. अधिकरण कारक – (में, पर, ऊपर) संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया का आधार सूचित होता है उसे अधिकरण कारक कहते है। जैसे – किताब मेज पर रख दो।
  8. सम्बोधन कारक – (हे,हो,अरे,हरे,ओह) संज्ञा के जिस रूप से किसी को पुकारने, चेतावनी देने, या संबोधित करने का बोध होता है, उसे सम्बोधन कारक कहते है। जैसे – ओह! मेरे साथ क्या हो गया।

सर्वनाम

सर्वनाम की परिभाषा – वे शब्द जो संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाते है, उन्हे सर्वनाम कहते है।

उदाहरण – सीता एक अच्छी लड़की है, वह अपनी पढ़ाई करती है।  यहाँ ‘वह’ शब्द सर्वनाम है।

सर्वनाम के भेद – व्यावहारिक आधार पर सर्वनाम के छः भेद होते है।

  1. पुरुषवाचक सर्वनाम – वक्ता, श्रोता तथा अन्य जिसके सम्बन्ध में बात हो आदि का बोध करने वाला सर्वनाम पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाता है। इसका प्रयोग स्त्री, पुरुष दोनों के लिए होता है। पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार का होता है-
    • उत्तम पुरुष – (मैं, हम एवं इनकी कारक विभक्तियाँ) कोई लेखक या वक्ता जिन सर्वनामों का प्रयोग अपने लिए करता है, उसे उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते है जैसे- में लिखता हूँ। इस वाक्य में वक्ता या लेखक ँ अपने लिए में सर्वनाम का प्रयोग किया है।
    • मध्यम पुरुष – (तुम, आप एवं इनकी कारक विभक्तियाँ) जिस सर्वनाम के द्वारा लेखक या वक्ता अपनी बात कहता है। जैसे – तुम कहाँ गए थे।
    • अन्य पुरुष – जिस सर्वनाम के द्वारा वक्ता या लेखक किसी श्रोता या पाठक से जिसके विषय में बात करता है उसे अन्य पुरुषवाचक सर्वनाम कहते है। जैसे – यह कमल है। या ये बन्दर है।
  2. निजवाचक सर्वनाम – इसे कर्ता स्वंय के लिए प्रयोग करता है। जैसे – मैं स्वंय जाऊंगा। या हम खुद वहाँ जाकर काम देखेंगे।
  3. प्रश्नवाचक सर्वनाम – इसका प्रयोग प्रश्न पूछने के लिए किया जाता है। जैसे – आपके घर कौन आया था?
  4. सम्बन्धवाचक सर्वनाम – वे सर्वनाम शब्द जो एक वाक्य का सम्बन्ध, दूसरे वाक्य से जोड़ते है जेसे – जैसी करनी वैसी भरनी या जिसकी लाठी उसकी भैंस। इत्यादि
  5. निश्चयवाचक सर्वनाम – जिन सर्वनाम शब्दों द्वारा किसी वस्तु या व्यक्ति के बारें में बिल्कुल निश्चय ज्ञान होता है जैसे – यह पुस्तक मेरी है। या वह मेरा घर है।
  6. अनिश्चयवचक सर्वनाम– जिन सर्वनाम शब्दों द्वारा किसी निश्चित वस्तु का बोध न हो जैसे– बाहर कोई खड़ा है।

विशेषण 

परिभाषाः– वे शब्द जों संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते है। उन्हे  विशेषण कहते है। विशेषण जिसकी विशेषता बताता है उसे विशेष्य कहते है, तथा विशेषणों की विशेषता बताने वाले शब्द प्रविशेषण कहलाते है। उदाहरणः– राम बहुत ईमानदार है। 

विशेष्यः– जिसकी विशेषता बताई जाए, उन्हे विशेष्य कहते है। सामान्यतः ये संज्ञा/सर्वनाम ही होते है।  उदाहरणः- राम बहुत ईमानदार है। या आज बहुत गर्म दिन था। 

प्रविशेषणः– जो शब्द विशेषण की भी विशेषता बताये-  उदाहरणः- आज बहुत गर्म दिन था। या तुम बिल्कुल सुनसान जगह पर गये थे। य तुम घोर परिश्रमी हो। 

विशेषण के प्रकार– विशेषण चार प्रकार के होते है  

  1. गुणवाचक विशेषण 
  2. संख्यावाचक विशेषण 
  3. परिमाणवाचक विशेषण 
  4. सार्वनामिक विशेषण 
  1. गुणवाचक विशेषणः– जिन शब्दों द्वारा संज्ञा के गुण, दोष, रंग, दिशा, आकार, अवस्था, स्थान, गंध आदि बोध हों।  
    • गुण – इमानदार, अच्छा, भला 
    • दोष – बुरा, बेईमान 
    • रंग – लाल, काला, हरा 
    • दिशा – उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी, पश्चिमी 
    • आकार – चैकोंर, गोलाकार, वर्गाकार, बड़ा, छोटा 
    • अवस्था – स्वास्थय, बीमार, ठोस, द्रव, गर्म 
  2. संख्यावाचक विशेषणः– वे विशेषण शब्द जो संज्ञा/सर्वनाम की संख्या बताता है। स्थान – पंजाबी, हरियाणवी, भारतीय 
    • निश्चित संख्या वाचक विशेषण – जिन विशेषण शब्दों से संख्या की निश्चित मात्रा का ज्ञान हो जैसे- एक मेज, दस रुपये
    • अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण – अनिशीचीत संख्या का बोध हो। जैसे – कुछ रुपये, कुछ आदमी।
  3. परिमाणवाचक विशेषण– वह विशेषण शब्द जो संज्ञा/सर्वनाम की मापतौल बताता है। परिमाणवाचक विशेषण दो प्रकार के होते है
    • निश्चित परिमाणवाचक – जिन विशेषण शब्दों से संज्ञा की निश्चित मात्रा का बोध हो जैसे एक लीटर दूध, एक किलो दाल, दस मीटर कपड़ा
    • अनिश्चित परिमाणवाचक – अनिश्चित मात्रा का बोध हो जैसे – कुछ पानी, कुछ दूध आदि
  4. सार्व नामिक विशेषणः– जो शब्द सर्वनाम होते हुए भी विशेषण का कार्य करें। उदाहरणः– यह मोबाइल मेरा है। ये किताबें किसकी है। वह पंखा तुम्हारा है। 

विशेषण की अवस्थाएँ (Degree) – हिन्दी में तुलनात्मक विशेषण की तीन अवस्थाएं होती है

  1. मूलावस्था – इसमें तुलना नहीं होती, सामान्य रूप से विशेषता पाई जाती है जैसे – अच्छा, बुरा
  2. उत्तरावस्था – इसमें दो की तुलना करके एक की अधिकता या न्यूनता दिखाई जाती है जैसे- अनिल, रमेश से अधिक बलवान है।  
  3. उत्तमावस्था – इसमें अनेक वस्तुओं, भावों की तुलना करके किसी एक को सबसे अधिक या न्यून बताया जाता है। जैसे – अंकित स्कूल में सबसे अधिक बुद्धिमान है।

तुलनात्मक विशेषण की दृष्टि से विशेषणों की अवस्थाएं

मुलावस्थाउत्तरावस्थाउत्तमावस्था
लघुलघूत्तरलघूत्तम
उच्चउच्चतरउच्चतम
अधिकअधिकतरअधिकतम
कोमल  कोमलतरकोमलतम
Hindi Grammar/ Hindi Vyakaran

क्रिया

क्रिया की परिभाषा – जिस शब्द से किसी कार्य का होना या होना पाया जाता है, उसे क्रिया कहते है। जैसे – खाना, पीना, लिखना, उठना, वैठना, दोड़ना, कूदना इत्यादि।

क्रिया के मूल रूप को घातु कहते है, घातु के आगे ना शब्द जोड़ने से क्रिया का सामान्य रूप बन जाता है। जैसे- पढ़ घातु में ना जोड़ने से पढ़ना बन जाता है, दोड़ घातु के आगे ना जोड़ने पर दौड़ना बन जाता है।

क्रिया के भेद – क्रिया के मुख्य दो भेद होते है

  1. सकर्मक क्रिया– जिस क्रिया को पूरा होने के लिए कर्म की आवश्यकता होती है उसे सकर्मक क्रिया कहते है। जैसे – हँसना, मारना, लिखना, बोलना आदि
  2. अकर्मक क्रिया – जिस क्रिया को पूरा होने के लिए कर्म की आवश्यकता न हो। जैसे- सोना, रोना, बैठना, दौड़ना, कूदना, उड़ना, उतरना आदि।

क्रिया के उपभेद – क्रिया के अन्य छः उप भेद है

  1. प्रेरणार्थक क्रिया – इसमें कर्ता किसी कार्य को स्वंय न कर बल्कि करवाता है। जैसे – पकाने से पकवाना, धुलने से धुलवाना, लिखना से लिखवाना इत्यादि
  2. पूर्वकालिक क्रिया– ऐसी क्रिया जो किसी क्रिया से ठीक पहले घटित हुई हो। जैसे – वह खाकर सो गया, वह चाय पी कर गया।
  3. नमधातु क्रिया – ऐसी क्रिया जो संज्ञा या सर्वनाम से बनाई गई हो। जैसे – हाथ से हथियाना, गरम से गरमाना, बात से बतियाना, लाज से लजाना आदि
  4. सयुक्त क्रियाएं – एक से अधिक धातु (क्रियाओं) के योग से बनने वाली क्रियाएं सयुक्त क्रियाएं कहलाती है है जेसे- अब हमे जाने दो, तुम वहाँ कब से रहते हो आदि
  5. द्विकर्मक क्रियाएं- दो कर्म वाली क्रियाएं या जिस क्रिया में दो कर्म होते है, अर्थात जहाँ क्या और किसको दोनों का जबाब मिले जैसे – माँ ने रमेश को सेब दिया, राम ने श्याम को थप्पड़ मारा।
  6. सहायक क्रियाएं – सहायक क्रियाएं मुख्य क्रिया के साथ प्रयुक्त होकर उसके अर्थ को पूर्ण करने में सहायक होती है। जैसे – में मन्दिर जाता हूँ, तुम रो रहे हो।

काल

काल की परिभाषा– क्रिया के रूप से कार्य की पूर्णता या अपूर्णता का बोध हो उसे काल कहते है

काल के भेद – कल के तीन भेद होते है।

  1. भूतकाल
  2. वर्तमान काल
  3. भविष्य काल

भूतकाल – भूतकाल का अर्थ होता है ‘बीता हुआ’। क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय का पता चले उसे भूतकाल कहते है। अर्थात जिस क्रिया से कार्य के समाप्त होने का पता चले उसे भूतकाल कहते है।

भूतकाल के भेद – भूतकाल के छः भेद होते है

  1. सामान्य भूत – क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय का निश्चित ज्ञान न हो जैसे – पंखा चला, गीता गई। तुम स्कूल जाते थे। (ता,था,ती,थी,ते,थे आदि आए)
  2. आसन्नभूत – आसन्नभूत बीते समय में थोड़ी देर पहले या कुछ समय पहले हुई क्रिया को दिखाता है जैसे में पढ़ चुका हूँ। मैं खाना खा चुका हूँ।
  3. पूर्णभूत – क्रिया के जिस रूप से बहुत पहले हो चुकी क्रिया की समाप्ति का बोध हो उसे पूर्ण भूत कहते है। जैसे – तुम्हारा भाई पढ़ चुका था, मैं खाना खा चुका था।
  4. संदिग्ध भूत- बीते समय में हुई क्रिया के होने में संदेह हो जैसे – श्याम ने गाया होगा। उसने अपना पाठ याद कर लिया होगा।
  5. अपूर्ण भूत – क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो की बीते समय में क्रिया जारी थी या हो रही थी। जैसे – काम चल रहा था, रेडियो बज रहा था।
  6. हेतु हेतु मद् भूत – क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो की क्रिया भूतकाल में होने वाली थी पर किसी कारणवश न हो सकी जैसे- तुम पहले पढे होते तो नौकरी लग गई होती।

वर्तमान काल – क्रियाके जिस पुर से वर्तमान समय में क्रिया के होने का पता चेले उसे वर्तमानकाल कहते है।

वर्तमान काल के भेद –वर्तमान काल के तीन भेद होते है

  1. सामान्य वर्तमान – क्रिया के जिस रूप से वर्तमानकाल में क्रिया का होना पाया जाए उसे सामान्य वर्तमान कहते है जैसे- वह पढ़ता है।
  2. संदिग्ध वर्तमान – वर्तमान काल में क्रिया के होने में संदेह पाया जाए। जैसे – वर्षा हो रही होगी।
  3. अपूर्ण वर्तमान – वर्तमान काल में क्रिया के अपूर्ण होने का बोध होता है। जैसे – वह पढ़ रहा है।

भविष्य काल – क्रिया के जिस रूप से क्रिया के आने वाले समय में पूरा होने का पता चले उसे भविष्य काल कहते है

भविष्य काल के भेद – भविष्य काल के तीन भेद होते है।

  1. सामान्य भविष्य – क्रिया के जिस रूप से भविष्य में होने वाले कार्य के पूर्ण होगा का पता चले उसे सामान्य भविष्य काल कहते है। जैसे – वह कल पढ़ेगा।
  2. संभाव्य भविष्य- क्रिया के जिस रूप से आने वाले समय में कार्य के पूर्ण होने की संभावना हो उसे संभाव्य भविष्य कहते है। जैसे – लगता है आज मेरा रिस्ता हो जाए।
  3. हेतु हेतु मद् भविष्यत् – (यदि वाली शर्त होगी) जिस क्रिया से भविष्य में एक समय में एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर हो। जैसे – यदि राम गाएगा तो में बजाऊँगा  

अव्यय

अव्यय की परिभाषा– जो व्यय न हो, ऐसे शब्द जिनके रूप में लिंग, वचन, कारक, काल आदि की वजह से कोई परिवर्तन नहीं होता है उसे अव्यय कहते है। अव्यय शब्द प्रत्येक स्थिति में अपने मूल रूप में रहते है। इन शब्दों को अविकारी शब्द भी कहा जाता है। जैसे- जब, तक, कभी, अगर, वहाँ, यहाँ, इधर, उधर, किन्तु, परंतु, तेज, कल, लेकिन, चूंकि इत्यादि

अव्यय के भेद – अव्यय के चार भेद होते है (अव्यय के मुख्य भेदों में क्रिया विशेषण नहीं आता अतः अव्यय मुख्यतः 3 प्रकार के होते है)

  1. क्रिया विशेषण
  2. सम्बन्ध बोधक अव्यय
  3. समुच्चय बोधक अव्यय
  4. विस्मयादि बोधक अव्यय

(1)-:क्रिया विशेषण – ऐसे शब्द जो क्रिया या विशेषण या अन्य क्रिया विशेषण की विशेषता बतायें उन्हे क्रिया विशेषण कहते है। जैसे धीरे चलो, सेब बहुत मीठे है।

क्रिया विशेषण के भेद – अर्थ के आधार पर क्रिया विशेषण के चार भेद होते है 

  1. स्थान सूचक – ये क्रिया के स्थान का बोध कराते है इसके दो भेद होते है।
    • स्थिति सूचक – यहाँ, वहाँ, सामने, भीतर, आगे, पीछे
    • दिशा सूचक – दायें, बाएं, इधर, उधर
  2. काल सूचक – क्रिया का समय का बोध कराती है। इसके तीन भेद होते है। 
    • समय बोधक – आज, कल, परसों, जब, तब, अब, कभी
    • अविधि बोधक –आजकल, लगातार, रातभर, दिनभर
    • पुनः बोधक – बार-बार, हर-बार, कई-बार
  3. रीति सूचक – क्रिया की रीति संबंधी विशेषता बताते है क्रिया कैसे हो रही है उसका बोध होता है। इसे निम्न भागों में बाँटा गया है
    • कारण बोधक- इसलिए, अतएव, नहीं, मत, न, ठीक, जी, सच, हाँ
    • प्रकार बोधक – अचानक, सावधानी से, योंही, साहस, धीरे-धीरे, मन से
    • निश्चय बोधक – आवश्य, जरूर, निःसंदेह
    • अनिश्चिय बोधक- शायद, यथा संभव
    • प्रश्नवाचक बोधक- क्या, कब, क्यों
  4. परिमाण सूचक – इसमें परिमाण (मात्रा) का बोध होता है। इसे निम्न भागों में बाँटा गया है।
    • पर्याप्ति बोधक – काफी, वहुत, वस, ठीक, बराबर आदि
    • तुलना बोधक- इतना, उतना, काम, अधिक
    • क्रम बोधक- क्रम से थोड़ा-थोड़ा, एक-एक, तिल-तिल
    • आधिक्य बोधक – खूब, अधिक, सर्वधा, बहुत, अत्यंत
    • न्यूनतम बोधक – जरा-सा, थोड़ा-सा, इतना-सा

(2):- सम्बन्ध बोधक अव्यय– वे शब्द जो संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध वाक्य के अन्य शब्दों से जोड़ते है, सम्बन्ध बोधक अव्यय कहलाते है। सम्बन्ध बोधक, संज्ञा/सर्वनाम के बाद आता है। जैसे – यह किताब मेज पर रख दो, या मे गोपाल के बिना नहीं जाऊंगा। सम्बन्ध बोधक अव्यय को निम्न प्रकार में बाँटा गया है।

  • संवद्ध सम्बन्ध बोधक – ऐसे अव्यय जो संज्ञा की विभक्ति के बाद लगे। जैसे – तुम राम की तरफ मत देखो।
  • अनुवद्ध सम्बन्ध बोधक – ऐसे अव्यय जो संज्ञा के विकृत रूप के बाद आते है। जैसे- गीता सहेलियों सहित खेलने गई।

सम्बन्ध बोधक के अन्य भेद-

  • कालवाचक- पहले, बाद, आगे, पीछे
  • स्थानवाचक- वाहर, भीतर, नीचे, ऊपर
  • सादृश्यवाचक – समान, तरह, भांति
  • तुलना वाचक – अपेक्षा, मुकाबले
  • दिशा वाचक – ओर, आस-पास
  • साधन वाचक – सहारे, द्वारा, जरिए
  • हेतु वाचक – भरोसे, वास्ते
  • विषय वाचक – भरोसे, लेख
  • विनिमय वाचक – बदले, अलावा, सिवाय, अतिरिक्त
  • विरोध वाचक – खिलाप, विपरीत, उलटे
  • सहचर वाचक – सँग,साथ, शीत, समेत
  • संग्रह वाचक – मात्र, पर्याप्त, भर, तक

(3):- समुच्चय वाचक अव्यय – वे अव्यय जो दो वाक्यों या उपवाक्यों को जोड़ने का कार्य करते है जैसे- और, या, अथवा, फिर भी, नहीं तो, किन्तु, परंतु इत्यादि। समुच्चयवाचक अव्यय के दो भेद होते है।

  1. समानाधिकरण समुच्चय बोधक – जो अव्यय दो या दो से अधिक पदों, वाक्यों या शब्दों का संयोजन-विभाजन करते है (संज्ञा को सन्याय से, सर्वनाम को सर्वनाम से, विशेषण को विशेषण से) ये चार प्रकार के होते है।
    • सयोजक- और, तथा, एवं, व
    • विभाजक- या, अथवा, चाहें, नहीं तो
    • विरोध दर्शक – लेकिन, किन्तु, परंतु, अगर, बल्कि
    • परिमाण दर्शक – इसलिए, अतः
  2. व्याधिकरण समुच्चय बोधक – ऐसा वाक्य जो दूसरे वाक्य पर निर्भर हो, तथा उसको जोड़ने के लिए उपयोग होने वाला अव्यय व्याधिकरण समुच्चय बोधक होता है जैसे – जबतक, पहले, यदि, फिर भी, क्योंकि आदि। ये तीन प्रकार के होते है।
    • कारण वाचक – क्योंकि, जोकी, चूंकि
    • उद्देश्य वाचक – कि, जो
    • संकेत वाचक – यदि/अगर, तो यद्यपि, तथापि

(4):- विस्मयादि बोधक अव्वय- वे अव्यय जो दुख, खुशी, आश्चर्य, भावों को व्यक्त करते है जो स्वतः ही अंदर से निकलते है जैसे- ओह, उफ़, बाप रे, अरे आदि। ये पाँच प्रकार के होते है

  • घृणा- हि, थू
  • स्वीकृति- अवश्य, जी जी, हाँ
  • सम्बोधन- अरे, यारी, रे,री
  • अनुमोदन- अच्छा, ठीक, हाँ हाँ
  • शोक- हाय!, उफ़, ओह

निपात

निपात की परिभाषा- वे शब्द जिनका कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता पर संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, के साथ जुड़कर उनको ज्यादा प्रभावी बना देते है। जैसे- भी, ही, मात्र, सा आदि

निपात के भेद – निपात के मुख्यतः 9 भेद होते है।

  1. स्वीकार्थक- हाँ, जी, जी हाँ
  2. नकारात्मक – नहीं, न, जी नहीं
  3. निषेधार्थक – मत्
  4. प्रश्नवाचक – क्या में
  5. विस्मार्थक – काश, क्या
  6. बलदायक – तो, ही
  7. तुलनार्थक – सा
  8. अवधारणाबोधक  – ठीक, लगभग, करीब
  9. आदर सूचक – जी

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हिन्दी व्याकरण (Hindi Grammar) की महत्वता

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